हम सभी कामना करते हैं कि हमारे परिवारजन, मित्र और परिचित अपने अपने जीवन में सुखी रहें। हम सभी, अपनी बातों और व्यवहार से प्रयत्न भी यही करते हैं की हम किसी को दुःख ना पहुँचाएँ। हम सभी अपना जीवन धर्म निभाते हैं — उसके अंजाम स्वरूप हम दूसरों के जीवन में कुछ पल सुख के जाने अनजाने में बिखेरते रहते हैं।
व्यक्तित्व और चरित्र के धनी इसकी अनुभूति तुरंत कर लेते हैं और अपनी कृतज्ञता को दर्शाने में कोई कमी नहीं रखते हैं। कुछ शब्द अथवा व्यवहार कुशलता के मितव्ययी प्राणी, समझ कर भी इस भाव को व्यक्त नहीं कर पाते! और कुछ सम्बंध ऐसे बन जाते हैं जहाँ इस प्रकार के प्रदर्शन की गुंजाइश ही नहीं होती!
अब प्रश्न यह उठता है कि ख़ुशी का स्रोत क्या है?
या यूँ कहें कि ज़िंदगी का उद्देश्य क्या है?
ये कुछ विचार ग़ौर करने योग्य हैं! लगते काफ़ी समान हैं पर इनमें सूक्ष्म भिन्नता है ——
पहला — दूसरों की ख़ुशी की कामना करना। दूसरों की ख़ुशी से स्वयं को ख़ुश पाना!
दूसरा — कार्य इस हेतु करना कि अन्य को ख़ुशी मिले।
तीसरा — अपना कर्म करना, धर्म निभाना।
मेरी समझ में, मात्र इस आख़री हरकत पर हमारा वश है। दूसरों को ख़ुशी देना हमारे कार्य क्षेत्र के सीमित दायरे में समा नहीं सकता। शायद मानव का अहंकार होता है जो इस सोच को पनपने की ऊर्जा देता है।
ख़ैर…
ये एक विडम्बना है — ख़ुशी — अपनी तो कर्म पूर्ति के संतोष मात्र से भी प्राप्त हो जाती है। पर की, हमारे वश से परे है। हर निज को अपना स्रोत तलाशना ही होगा!
तो फिर, क्या है आपके जीवन का उद्देश्य?
स्वयं प्रासन्न रहना?
अथवा अन्य लोगों की ख़ुशी की मृग-मरीचिका को छूना?
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