चटक इन्द्रधनुषी रंग लपेटे
नाना प्रकार, विस्मयीं आकार समेटे ।सींचाई करते दुलार, नमीं, पोषण, धूपऋतु आगमन उपरांत ही खिलते हैं पुष्प ॥
कुछ सूर्य का मुख चूम चूम
कई रात्रि की शीतलता में झूम झूम ।
अवधि कुसुमित रहने की विविध
असीम आभा! कहाँ उस पर आश्रित ॥
खिलने को प्रयत्नशील हर कलि इठलाये
तुलना की तपिश में नज़ाकत कुमल्हा ना जाये ।
हर ख़ुशबू रूहानी, चिर परिचित
प्रोत्साहन की चाह, हृदय में निहित ॥
इक इक फूल करता बगिया को कृत-रचित
झिलमिलाती संगीत संध्या हर नृत्य से सुशोभित ।
स्नेह, सराहना सबकी सर आँखों पर लिये
हम आशीर्वाद के लिए सदैव झोली फैलाये खड़े ॥
~ दिव्या
नमस्ते !
बच्चियों ने पारिवारिक नृत्य संध्या में भाग लिया और उनकी रचना एवं प्रस्तुति की भरपूर प्रसंशा हुई। हमारा मन उनकी इस कोशिश की कामयाबी से पुलकित हुआ जाता था!
योजना में घर के अन्य छोटे बड़े बच्चों ने भी हिस्सा लिया था। उनकी प्रतिभा, शैली और प्रयत्नों को नकारती सी प्रतीत हुई वाहवाही एवं टिप्पणियाँ — जब चर्चा सिर्फ़ दो बच्चों की दुहरायी जा रही थी और उन्हें अव्वल दर्जा प्रदान किया जा रहा था।
उस चिंतन से उपजी है यह कविता। उम्मीद रखती हूँ कि यह मेरे भाव व्यक्त कर पायी !
पढ़ने के लिए धन्यवाद।
आप अपने विचार कॉमेंट्स सेक्शन में लिख कर मुझ तक पहुँचा सकते हैं।
No comments:
Post a Comment
Did my post trigger any feelings or thoughts? It will be lovely to hear. Please do share through a comment.